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माता के स्वरुप का वर्णन

शीतला माता सात बहनें - आयुवैदिक चिकित्साय के चिकित्सरकों के कथानुसार शीतला प्रकोप – (संक्रमण रोग चेचक) के श्रेणी में साधारण फोड़े-फुंसी से लेकर कई तरह के चर्म रोग शामिल है, किन्तु चिकित्साह शास्त्रीभ मुख्यय रूप से चेचक रोग को सात रूप में पहचान किया है। रोग के प्रकोप (लक्षणों) में थोड़ी बहुत अंतर पाये जाते हैं उपचार में भी थोड़ी बहुत परिवर्तन किये जाते हैं, किन्तुज इन सात श्रेणियों में कई समानता पाई जाती है। आचार्य ने चेचक रोग के मुख्या सात श्रेणियों को शीतला सातों बहन कह कर संबोधित किया है। रोग के लक्षण के अनुसार इन्हेंा अलग-अलग देवियों के नाम से जाना जाता रहा है।



माता का स्व रूप - धर्म ज्ञाताओं (आचार्यो) ने शीतला माता को अति शक्ति्शाली (स्वोस्य् बो शरीर वाली) पूर्ण दिगम्बररा (नग्न रहने वाली) "दिशाएं ही जिनके वस्त्रब हो" बताया है। नग्न कंचन काया (प्रदर्शन योग्य् निरोग काया) वाली महादेवी मानते आये हैं। आरोग्यंता प्रतीक के रूप में पूजन करने की प्राचनी प्रथा बनाई गयी थी। ब्रह्य पुरान, शिव पुरान, विष्णुर पुराण सहित देवी पुराण में प्रबल असुरी शक्ति्यों के विनाश हेतु विभिन्नण देवियों के अवतार का विस्तृतत वर्णन किया गया है। अति विनाशकारी महादेव्यत रक्त बीज को नाश करने वाली महाशक्तिश कालिका (काली) को भी दिगम्बारा ही माना जाता है।

सफेद वस्त्रर – किन्तुल सामाजिक मान्यगताओं व अन्यम स्था नीय धारणाओं के कारण कुछ स्थािनों पर माता शीतला को श्वे्त वस्त्रा धारी भी बताया गया है। श्वे्त वस्त्रश पूर्ण स्वशच्छवता (प्रतिष्ठा ) का घोतक (प्रतीक) माना जाता है चूँकि हम माता शीतला को रोग विनाशिनी मानते हैं। अत: श्वे)त वस्त्रा की परिकल्पिना करना स्वा भाविक कहा जा सकता है। आज भी ज्यातदातर चिकित्समक व उनके सहायक उपचार के दौरान सफेद वस्त्रों का धारण करते हैं।

सूप, झाडू तथा कलश – शीतला माता के मस्त क सूप से अंलकित तथा हाथों में झाडू तथा कलश दिखाया जाना पूर्णत: स्वकच्छ ता का प्रतीक माना जाता है। विशेषकर साफ सफाई की ओर गृहणियां का ध्या न आकृष्टत करने के उद्देश्यक से इन वसतुओं का संबंध माता शीतला से जोड़ा गया होगा ताकि स्थाओनीय गृहणियों माता शीतला को प्रसन्नि करने के उद्देश्यअ से प्रात: उठने के बाद संपूर्ण गृह की साफ-सफाई (स्वशच्छ ता) में लग जाये। घर का वातावरण पवित्र रहे, स्वनयं स्नादन कर पिवत्र वस्त्रा (साफ वस्त्र ) पहन कर भोजन इत्यावदि बनाये अथवा उसके पहले देवी पूजन कर प्रसन्न रहे। कलश का अर्थ अमृत भरा (औषधियों) का पात्र दिखाया गया है।

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