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अति प्रचीन शीतला मंदिर

शीतल मंदिर का इतिहास

पाठकों पूर्व में लिखा जा चुका है कि सनातन समाज में सदियों से रोग-निवारण (विनाशिनी) माता शीतला का दर्शन-पूजन अर्चना की परम्पनरा चली आ रही है। भारत वर्ष के पूर्वोत्तजर प्रांतों के वासियों की धार्मिक मान्यपता रही है कि माता शीतला के विधिपूर्वक दर्शन-पूजन से शीतला प्रकोप (चेचक रोग) होने का भय नहीं रहता है। प्रकोप होने पर भी शीतला पूजन के विधि पूर्वक पालन से प्रभावित जातक का दाह (दर्द) का निवारण हो जाता है तथा प्रभावित जातक (चेचक का रोगी) जल्दभ स्वास्य्जात हो जाता है। परिवार तथा आसपास के पड़ोसी शीतला प्रकोप (क्रोध) से बच जाते हैं। स्थानीय श्रद्धालू माता को प्रसन्नी करने के उद्देश्या से परिवार-समाज के बड़े बुजूर्गो के निदेशानुसार बताये गये नियमों का श्रद्धा पूर्वक पालन करते आ रहे हैं। कोप-निवारण (रोग निवारण) के पश्‍चात् भी जातक के परिजन स्‍थनीय महारानी (शीतला) स्था न पर जाकर धुम-धाम से पूर्ण विधि-विधान से देवी पूजन करते आ रहे हैं। वर्तमान काल में संक्रमण रोग (चेचक) पर चिकित्साध शास्त्रस ने नियत्रंण कर लिया है, किन्तुम शीतला स्थाणनों की महत्व्ा शतता और बढ़ गई है। आरोग्यीता प्रदान करने वाली महारानी शीतला मंदिरोंमें प्रतिदिन हजारों श्रद्धालूओं जाकर पूर्ण्‍ श्रद्धा से दर्शन पूजन करते हैं, एवं पुण्यत लाभ पाते हैं। ऐतिहासिक अगमकुऑं के समीप प्रतिष्ठिीत अति प्रचीन शीतला मंदिर भी उन्हींि दिव्यम स्थिलों में एक हैं। चूंकि ये दिव्यं स्थपल (शीतला स्था न) ऐतिहासिक तथा धार्मिक दोनों दृष्टिो से अति महत्व्पूर्ण हैं। एक लेखक होने के नाते इस निकटतम पूजन स्थहल का इतिहास लिखना अपना नैतिक कर्तव्यल मानता हूँ। किन्तु इस दिव्य स्थखल का ज्ञात इतिहास लिखने से पूर्व समस्तक श्रद्धालु पाठक को यह बतना आवश्य्क समझता हूँ कि इस शीतला स्थासन का इतिहास संबंधित कोई प्राचीन पुस्त क उपलब्धस नहीं है।

इस दिव्यद स्थेल का इतिहास इधर-उधर बिखरे ऐतिहासिक अंशों, पौराणिक साक्ष्योंि, धार्मिक मन्य-ताओं पुरातत्वा विदो के शोध के निष्ककर्ष सहित प्राचीन मंदिर के वर्तमान पुजारी श्री संजीत पासवान के पीढि़यों के अनुभव तथा स्थारनीय नागरिकों के कथन पर पूर्णत: आधारित है। यदि किसी तथ्ये में थोड़ा भी अंतर आया तो इतिहास में अंतर आना स्वारभाविक है। इसलिए प्रस्तुित आलेख को प्राचीन शीतला मंदिर का प्रमाणित इतिहास माने जाने का दावा करना मैं उचित नहीं मानता हूँ। फिर भी आपनी ओर से महत्तावपूर्ण तथ्योंम के संयोजन (संकलन) में पूरी सावधानी बरती है। इस बात का पूरा ध्याुन रखा है, कि सही तथ्यों को ही उजागर (प्रकाशित) कँरू ताकि श्रद्धालु पाठकों को प्राचीन शीतला मंदिर के विषय में ज्याीदा-से-ज्याकदा सच्चीु जानकारी (ज्ञान) उपलब्धर करा सँकू। अब तक प्राप्तो जानकारी के अनुसार अब से हजारों वर्ष पहले स्थाहनीय तुलसी मंडी सहित आसपास के स्था नीय निवासियों ने ऐतिहासिक अगमकुऑं के समीप पश्चि म दिशा में एक ऊँचे टिलेनुमा स्थोल पर शीतला सातों बहन सहित भैरो और गोरैया की कुल नौ पीण्डीटयों की स्थालपना की थी। उक्तत काल में ये देवी पण्डिरयॉं पीली मिट्टी से बनाई गई थी। उक्तस स्थाल पर कोई मंदिर नहीं था। चारों ओर घने जंगल से घिरे शीतला स्था न के दक्षिण दिशा में सोन व गंडक नदियों की जलधारा पश्चििम से पूर्वी . प्राचीन शीतला मंदिर के पुजारी श्री संजीत पासवान सहित तुलसी मंडी ग्राम के निवासियों के कथानुसार तुलसी मंडी ग्राम में एक गृह-निर्माण के दौरान मिट्टी खुदाई के क्रम में सदियों पाले दो दिव्या देवी मुर्तियों के दर्शन हुए थे। प्रथम मुर्ति काले पाषाण से निर्मित खड़ी अवस्थाय में थी। जबकि दूसरी मूर्ति गोद में बच्चा् लिए किसी अन्य देवी की रही होगी। पहली मूर्ति को स्थादनीय लोगों ने बाहर निकाल दिया, किन्तुि दूसरी देवी मूर्ति को ग्रामीण के अथक प्रयास के उपरांत भी बाहर नहीं निकाला जा सका। दूसरी देवी मूर्ति पाताल में विलिन हो गई प्रथम देवी मूर्ति को (खड़ी प्रतिमा) की पहचान स्थावनीय ज्ञाताओं ने शीतला के रूप में किया।

तथा गा्रम से दक्षिण दिशा में तेन्दूसल तल नामक स्थाकन पर प्रतिष्ठिदत कर दर्शन-पूजन करने लगे। प्राप्तम देवी मूर्ति काले पाषाण से निर्मित भव्य‍ आकर्षक तथा खड़ी अवस्था में प्राप्ता हुई थी, इसलिए स्थाेनीय श्रद्धालु खड़ी मईया, बड़ी मईया, विधी मईया, शीतला मईया, बाईसी मईया, बरकी महारानी इत्याकदि से संबोधित कर दर्शन-पूजन करते आ रहे हैं। प्राप्त् देवी मूर्ति किसीऔर काल की किसी अन्य देवी का होना संभव है। क्योंैकि किसी अन्यस शीतला मंदिर में ऐसी प्रतिभा स्था‍पित करने का इतिहास अबतक प्राप्तै नहीं हो सका हैं। संभवता यह देवी प्रतिमा आर्यो की उतराद्ध काल की हो सकती हैं। प्राप्त् देवी मूर्ति के हाथ में माद धारण की गई है। संभवता यह अति प्राचीन शीतला मंदिर भारत वर्ष का इकलौता मंदिर होगा, जहॉं इतनी प्राचीन शीतला माता की प्रतिमा स्थारपित किया गया होगा। जब यह देवी प्रतिमा तेन्दु ल तल नामक स्थािन में प्रतिष्ठिात थी, उसी काल में तत्काललीन नगर प्रमुख को देवी ने स्वाप्न‍ में दर्शन देकर यह आदेश दिया कि मुझे भी वही प्रतिष्ठिीत कर दो जहॉं मेरा स्थादन बना हुआ है। नगर प्रमुख ने स्थादनीय श्रद्धालुओं से विचार विर्मश कर देवी इच्छार के अनुरूप चैत मास के आखिरी मंगलवार को बत्तीनस कहारो द्वारा ढोई जानेवाली सजी-धजी डोली में गाजे-बाजे के साथ अगमकुऑं स्थिोत शीतला स्थावन में पूर्ण श्रद्धा पूर्वक प्रतिष्ठिेत कर दिया। स्थाथनीय श्रद्धालु भजन कीर्त्तीन करते हुए माता की डोली के संग-संग गये थे। स्थािनीय मान्य।ता के अनुसार तुलसी मंडी के ग्रामवासी प्रतिवर्ष उस शुभ तिथि को शीतला मंदिर में जूटकर विशेष दर्शन-पूजन करते चले आ रहे हैं। उक्त विशेष तिथि की मंदिर सहित माता का विशेष श्रृगांर किया जाता है। स्थाैनीय श्रद्धालुओं द्वारा पूर्ण पवित्रता से तैयार विशेष भोग भी लगाया जाता है। भैरो, गोरैया तथा देवीयों के जोगीनों को प्रसन्नि करने के लिए वलि भी चढ़ाई जाती है, तथा मंदिरा भी समर्पित किया जाता है। विगत कई वर्षो से यह विशेष-वार्षिक पूजन स्थाथनीय भगत श्री वासुदेव पासवान के नेतृत्वि में सम्पहन्न- हो रहा है। ऐतिहासिक दस्तातवेजों में वर्णित तथ्योंत के अनुसार मुगलकाल में मंदिर सहित आसपास का इलाका रसिदाचक के नाम से मशहुर था।

मंदिर सहित आसपास की भूमि एक स्थाूनीय नवाव घराने की नीजी मिल्किसयत (सम्प ति) हुआ करती थी। उक्तम नवाव घराने की एक भद्र महिला मो. असम तुनीसा बेगम उर्फ सहजादी साहिबा ने हिन्दु ओं की पवित्र धार्मिक भावनाओं की केन्द्रम करते हुए वर्तमान पुजारी श्री संजीत पासवान के पूर्वज स्वनर्गीय मनु पासवान को 23 सितम्बंर 1874 ई. में वसियत कर सुपूर्त कर दिया। उक्त हुकुमनामे की सच्चीा प्रति आज भी पुजारी जी के पास सुरक्षित हैं। उक्त। काल से स्वार्गीय मनु पासवान के वंशज पुनित कर्तव्योंु का निर्वाहन करते आ रहे हैं। सहजादी साहिबा का यह महान कार्य सराहनीय, अनुकरणीय तथा धार्मिक सद्भावना का अनूठा मिशाल कहना ज्या दा श्रेष्ठअकर होगा। उक्तर नवाव घराने का खानदानी तकिया (कब्रिस्ताहन) ऐतिहासिक अगमकुऑं से सटे चारहदीवारी से घिरा दक्षिण-पूरब दिशा में स्थिदत है। पाटलीपुत्र की नगर देवी शीतला माता के प्राचीन मंदिर का जिर्णोद्वार सन् 1996-97 में तत्कारलीन मुख्य मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव के प्रबल इच्छा तथा वर्तमान पुजारी श्री संजीत पासवान तथा अन्यत श्रद्धालुओं के प्रयास तथा समर्पित सहयोग के कारण सांसद श्री प्रेम कुमार के संसदीय कोष से किया गया था। वर्तमान काल में प्राचीन शीतला मंदिर अति भव्यम तथा आकर्षक स्वारूप धारण कर चुका है। विशाल संगमरमर मंदिर प्रांगण चारो ओर से चाहरदीवारी से घिरा हुआ है। जाहरदीवारी में पश्चिंम दिशा में विशाल प्रवेश द्वार लगा हुआ है। जिसमें मजबूत लोहे का भव्यप गेट लगा है। मुख्यर द्वार के ऊपर दोनों ओर दो सिंह तथा केन्द्र में देवी चक्र स्थिंत है। विशाला मंदिर प्रांगण में मौर्य कालीन अगमकुआं वैष्णो माता मंदिर विशाल हवल कुंड सीढ़ी, चबूतरा समारोह हॉल, सुरक्षकर्मी निवास सहित शौचालय, स्ना़नगृह, कुआं इत्याोदि बने हुए हैं। प्रांगण के अंदर नीम, पीपल तथा वटवृक्ष भी सुशोभित है। प्रांगण के पूर्वी उत्तोरी कोण को घेरकर भैरों स्था न (बलि स्थाकन) बना हुआ है। विशाल प्रांगण के बीच में शीतला माता का भव्य। मंदिर स्थिकत है। जिसका अन्या दिशाओं से भी छोटे-छोटे प्रवेश द्वार बने हुए हैं। जिनमें लोहे के ग्रील (गेट) लगे हुए है। शीतला मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार से अन्देर जाने पर एक बड़ा कक्ष मिलता है। जिसके पश्चिबम दक्षिण कोण में पूर्वमुखी माता शीतला की दिव्या मूर्ति का दर्शन होता है। स्वमर्ण ऑंखों वाली मुकूटधारी माता

वस्त्र -आभुषण एवं फूल-मालाओं से सदैव सुसज्जिेत रहती है। दिव्यड मूर्ति मंडपनुमा ऊँचे चबूतरे के ऊपर प्रतष्ठिलत है। उक्तै पवित्र-स्थ।ल को पवित्रता के उद्देश्य से लोहे तथा पीपल के मोटे सलाखों से घेरा गया है। उस घेरे के अंदर मात्र मंदिर के पुजारी जाते हैं। शेष श्रद्धालु घेरे के बाहर से दर्शन करते हैं। माता शीतला के प्राचीन मूर्ति के पास अंगारा माता की छोटी तथा दाहिने पीण्डीह रूप में जोगिन विराजमान हैं। शीतला मूर्ति के पृष्टत भाग में मंदिर के मुख्य‍ गुम्म्द (मंडप) के ठीक नीचे एक लंबे कक्ष में ऊँचे चबुतरे पर माता शीतला सातो बहन भैरो और गोरैया की नौ पीण्डिएया स्थाबपित हैं। जिसका प्रवेश द्वार शीतला मूर्ति के बाई ओर बड़े हॉल में खुलता है। भीतरी कक्ष का निकास द्वार उत्तिर दिशा की ओर है। ये भव्यल देवी पीण्डिषया पीत्त ल के खोल तथा मुकूट से सुशोभित हैं। प्राचीन शीतला मंदिर में सदियों से समस्त् मंगल कार्य सम्प न्ने होते आ रहे हैं। यज्ञ, हवन, दर्शन, पूजन अर्चन, प्रवचन सहित वर-वधू निरक्षण, जनेऊ मुण्डीन तथा विवाह इत्या दि मंगल कार्य सम्पचन्न होते हैं। वर्तमान काल में यह प्राचीन शीतला मंदिर बहुत प्रसिद्ध हो चुका है। इस दिव्य् स्थनल पर दूर-दूर से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ थोड़ा ज्यायदा रहती हैं। देवी पूजन के विशेष तिथियों को अपार श्रद्धालुओं के भीड़ के कारण दर्शन-पूजन करने में घंटों का समय लग जाता है। मंदिर प्रबंधक कमिटी तथा स्थादनीय प्रशासन विधि-व्येवस्थाल बनाये रखने के लिए व्यामपक प्रबंध करती है। हर समय श्रद्धालुओं के चहल-पहल से सुशोभित भव्यव शीतला मंदिर पहुँचकर दिव्‍य अनुभूति की प्राप्तिल होती है जिसे शब्दोंत में व्यीक्तु करना संभव नहीं है। श्रद्धालु स्वायं पहुँचकर अध्याेत्मन आनंद की अनुभूति प्राप्त करें। अंत में मैं शीतला माता के श्री चरणों में नतमस्तीक वंदन कर इस आलेख को यही विराम देता हूँ। बाद में कुछ अन्यम जानकारी प्राप्त होने के बाद कुछ अन्य तथ्यों को जोड़ा तथा इस आलेख में संशोधन किया जा सकता है।

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